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राजीव रंजन प्रसाद की क्षणिकाएं

आस्था और क्षणिकायें-राजीव रंजन प्रसादआस्था -१मुझे गहरी आस्था है तुम परपत्थर को सिर झुका करमैने ही देवत्व दिया थाफिरतुम तो मेरा ही दिल हो..आस्था -२हमारे बीच बहुत कुछ टूट गया हैहमारे भीतर बहुत कुछ छूट गया हैकैसे दर्द नें तराश कर बुत बना दिया हमेंऔर तनहाई हमसे लिपट करहमारे दिलों की हथेलियाँ मिलानें को तत्पर हैपत्थर फिर बोलेंगेये कैसी आस्था?आस्था -३सपना ही तो टूटा हैमौत ही तो आई है मुझेजी नहीं पाओगे तुम लेकिनइतनी तो आस्था है तुम्हेमुझपर..आस्था -४पागल हूं तो पत्थर मारोदीवाना हूँ हँस लो मुझपरमुझे तुम्हारी नादानी सेऔर आस्थाये गढनी हैं...आस्था -५तुमनेंबहते हुए पानी मेंमेरा ही तो नाम लिखा थाऔर ठहर कर हथेलियों से भँवरें बना दींआस्थायें अबूझे शब्द हो गयी हैंमिट नहीं सकती लेकिन..आस्था -६मेरे कलेजे को कुचल करतुम्हारे मासूम पैर ज़ख्मी तो नहीं हुए?मेरे प्यारमेरी आस्थायें सिसक उठी हैंइतना भी यकीं न था तुम्हेंकह कर ही देखा होता कि मौत आये तुम्हें<[...] Read full story