उर्दू शायर ‘ज़फ़र’ गोरखपुरी का एक दोहा है ः हद से अधिक संजीदगी, सच पूछो तो रोग, आगा-पीछा सोचते, बूढ़े हो गए लोग। कुछ लोग सदैव गंभीर बने रहते हैं। अवसादग्रस्त लटके हुए चेहरे लिए घूमते रहते हैं। उनकी त्वचा से, उनके चेहरों से उनकी उम्र का पता ही नहीं चलता। चालीस की अवस्था में साठ के प्रतीत होते है। जो लोग जितने गंभीर बने रहते हैं उतनी ही ज़्यादा उम्र के दिखते हैं और उसी के अनुसार उनका उत्साह भी मंद पड़ता जाता है। इस प्रकार हँसी का संबंध न केवल आरोग्य और दीर्घायु से है अपितु बुढ़ापा रोकने में भी हास्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वस्तुतः हास्य ही एकमात्र ओषधि है जो बाह्म रूप से आपके चेहरे की झुर्रियों को रोकने में सक्षम है ... [Follow Original Article link for full content.]
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