बही - खाता : संजय खाती

Posted on August 20th, 2008
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( सबद में कहानी को लेकर कोई बात नहीं हो रही थी। इस बाबत कुछ स्नेही बंधुओं ने उलाहना भी दिया। हमने आश्वस्त किया था कि जल्द ही कथा की बात होगी। इस बाबत हमने कथाकारों से आग्रह किया था कि वे हमें अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य हमारे पाठकों के लिए लिखें ताकि उनकी कहानी की कुछ और सिम्तें खुलें। ‘बही-खाता’ नामक यह स्तंभ हम हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार संजय खाती से शुरू कर रहे हैं। इनकी कहानियां बेसब्र प्रतीक्षा के बाद सामने आती हैं और चाव से पढ़ी जाती हैं। ‘पिंटी का साबुन’ और ‘बहार कुछ नहीं था’ दो संग्रह प्रकाशित हैं। )कहानी मन में ही चुक सकती हैसंजय खाती रचना प्रक्रिया पर जितना मैं सोचता हूं, यह पहेली उलझती जाती है। जिस मन से हम रचते हैं, क्या हम उसके स्वामी हैं ? जो हम रचते हैं, क्या वह हमारी कृति है ? जैसा कि हम जानते हैं मानव मस्तिष्क कुदरती विकास की देन है और अब इस बात के ज्यादा से ज्यादा सबूत साइंटिस्ट पेश कर रहे हैं कि दिमाग का जो कोर है, वह लगभग स्वायत्त तरीके से काम करता है। एक मन अपनी प्रतिभाओं के साथ हमें दे दिया गया है, जो माहौल से विकसित होता है और हम ज्यादा से ज्यादा जो कर सकते हैं, वह यही कि उसे पहचानें और उसके खिलने के लिए माहौल तैयार करते रहें।कला जब जन्म लेती है, तो क्या होता है ? आनंद ने जब कथा सुननी चाही, तो बुद्ध ने कहा था कि मानवों की कोई कथा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां दुःख ही दुःख है। देवताओं की भी कोई कथा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां सुख ही सुख हैं। यानी कहानी तभी हो सकती है जब सुख और दुःख के बीच की कोई स्थिति हो, यानी कलाकार एक ऐसी भावभूमि का जीव होता है, जो मर्त्यलोक और देवलोक के बीच कहीं अवस्थित है। हर कथा एक मानवीय दैवीय अनुभूति है, लेकिन वह धर्म नहीं है, क्योंकि वह निर्वान की कामना नहीं कर सकती, क्योंकि उसे बीच के उस झुटपुटे में टिके रहना है — अपने आनंद और अभिशाप के साथ। Read full story

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