जो अंधेरों से उठे तो फिर उजाला बन गयेक्या हुआ ‘गर जुगनु थे कल, अब सितारा बन गये जब उठा तूफ़ां तो हम सैलाब से बहने लगे डूबना था हम को देखो, पर किनारा बन गयेसोचते थे इस जहां में हम सभी से हैं जुदाराह चल के दूसरों की हम ज़माना बन गयेइस ज़मीं पर गिर के देखा, स्याह रातें काट लीउठ गये फिर आस्मां में और हाला बन गये(हाला- चंद्रमंडल/halo)‘दोस्त’ तुम को तो भरोसा था बड़ा तदबीर परतुम भी क्या तक़दीर का खु़द ही निशाना बन गये?—मानोशी ‘दोस्त’(तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ मैं महावीर शर्मा जी और प्राण शर्मा जी का जिन्होंने इस ग़ज़ल को सँवारने में मेरी मदद की साथ ही अनूप शुक्ल जी को धन्यवाद जिन्होंने हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह मुझे प्रोत्साहन दिया है, चाहे वो कोई लेख अप्रूव करवाना हो या कोई साधारण सी पोस्टिंग ही सही...)
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