तुम सिर्फ तुम

Posted on November 21st, 2008
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तुम,सदैव से हीतो रही होमेरा संबल, क्या कुछ नहींपाया मैंनेसिर्फ औरसदैव तुमसे. हर बार दुःख केअश्रुबिंदु तुम्हारी प्रेरणा से बने सुख के श्रमबिंदु विषमता की तपती रेत पर तुम्हारे अपनत्व की ठंडी फुहार हर एक हार को जिंदगी में तुम्हारी दृष्टि ने बदला जीत में किसी के भी प्रति द्वेष को तुमने ही तो बदलाप्रीत में अकेलेपन की धूपके तीखेपन में,तुमने ही तो छाँव दीवट बनकर कहीं किसी भंवर मेंडूब न जाऊं तुम मांझी बनकरसदैव मिले हर छोटी उपलब्धि जो मेरी होती तुम्हारे फैलाव मेंविराट हो जाती भीड़ में मेरे खो जानेपर भीतुम्हारे हाथ ने थामकर निकाला मुझे आज भी लगता है जैसेकि तुम हो अपनी चिर-परिचितव्यवस्था में क्योंकि तभी तोआज भी केवल तुम ही तो होमेरा संबल..

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