आदरणीय अनूप भइया, प्रणाम ज्ञात हो कि प्रणाम शब्द का उपयोग (प्रयोग नहीं) इसलिए किया क्योंकि हमारा हाथ संस्कृत में उतना ही तंग है जितना अंग्रेजी, उर्दू और फ्रेंच में. आपका लिखा हुआ ‘अत्र कुशलम तत्रास्तु’ लिख देते तो लोग कहते कि चिट्ठी का जवाब दे रहा है वो भी नक़ल करके. इसीलिए मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने सोचा पहली चिट्ठी तो असल लिखें, सिलसिला अगर आगे बढ़ा तो नक़ल करने के लिए मौकों की कमी थोड़े न रहेगी.. आपकी चिट्ठी की पहली लाइन पढ़कर ही लगा कि आगे खतरा है. अब देखिये न, एक तरफ़ तो आपने लिखा है परम प्रिय भाई और उसके आगे शिवजी टिका दिया. इसे पढ़कर पता चल गया कि नाम के आगे जी लगाने का मतलब ही है कि चिट्ठी में आगे जी का जंजाल भरा मिलेगा. लिहाजा पहली लाइन पढ़कर कलेजा कड़ा कर लेना पड़ा. मुझे मिले इस ऐतिहासिक उपाधि ‘जेंटलमैन’ से कानपुर में ऐसा हंगामा मचेगा, इसकी आशा नहीं थी. मुझे अगर इस बात का जरा भी आभास होता तो मैं प्रत्यक्षा जी से कहता कि वे इस उपाधि को अपने साथ वापस ले जाएँ और किसी ऐसे ब्लॉगर को दे दें जो कानपुर का हो. हाँ ऐसा होने से जेंटलमैन की कानपुरी व्याख्या के बारे में जानने का मौका हाथ से निकल जाता. वैसे भी आज की ताजा ख़बर के अनुसार इंग्लैंड और अमेरिका सरीखे देशों में इस व्याख्या को लेकर हंगामा मच गया है. ब्रिटिश पार्लियामेंट ने तो एक प्रस्ताव पारित करके बताया कि जेंटलमैन के बारे में कानपुरी व्याख्या की वजह से इतिहास में दर्ज बहुत बड़े-बड़े जेंटलमैनों की बखिया उधड़ सकती है. लिहाजा किसी बड़े आदमी के नाम के साथ जेंटलमैन शब्द को न जोड़ा जाय. अब जब इतने बड़े-बड़े लोग धरासायी हो गए तो मेरी क्या विसात? इस एक व्याख्या की वजह से मेरी जेंटलमैनी एक दिन में ही टें बोल गयी. वैसे मुझे खुशी इस बात की है कि एक दिन के लिए ही सही, मैं जेंटलमैनत्व को प्राप्त हो गया. लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस उपाधि प्राप्ति कार्यक्रम के बाद इस तरह की बातें होंगी जिससे इस महान उपाधि को छोटा बताने के तर्क खोजे जायेंगे. इस छोटा बताने के कार्यक्रम के तहत इस उपाधि को जेंटील तक से धो डाला गया. नतीजा ये हुआ कि उपाधि लत्ता बन गयी. अब मैंने फैसला किया है कि इस लत्ते को ओढ़ने से कोई फायदा नहीं है. जहाँ तक जेंटलमैन उपाधि के बारे में आपके द्बारा दिए गए कानपुरी तर्क की बात है तो मेरा यही कहना है कि आपको हमारे प्रियंकर भइया के पोएटिक जस्टिस वाली तलवार के वार की चिंता नहीं करनी चाहिए. आख़िर प्रियंकर भइया पोएट हैं. और पोएटिक जस्टिस की तलवार चलाने का हक़ एक पोएट से ज्यादा किसी को नहीं है. वैसे आपकी चिट्ठी के बारे में जब उन्हें जानकारी मिली तो उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि उन्होंने इसबार तलवार न उठाने का फ़ैसला कर लिया है. ऐसे में इस कानपुरी तर्क के बचे रहने की उम्मीद कायम है. हाँ, एक बात जरूर कहनी है कि ये उम्मीद तभी तक कायम है जब तक किसी और दिशा से तलवार नहीं उठ जाती.कैसे-कैसे सपने संजोये थे. जब से ब्लागिंग में आए हैं, हर दो महीने पर इस बात की चर्चा होती रहती है कि हिन्दी ब्लागिंग में राजनीति होती है. इस राजनीति पर होने वाले चर्चे और लिखी गई पोस्ट से हमें बड़ा हौसला मिला था. जेंटलमैन की उपाधि से लैस हम भविष्य में होनेवाले अखिल भारतीय हिन्दी ब्लॉगर महासभा का चुनाव लड़ने के सपने संजो रहे थे और एक व्याख्या की वजह से सब गुड़ गोबर हो गया. कहाँ मैंने सोचा था कि जेंटलमैन उपाधि का सर्टिफिकेट चमकाते हुए प्रचार करेंगे. और भी हथकंडे अपनाते और इलेक्शन जीत लेते. आख़िर माना हुआ जेंटलमैन अगर धांधली न करे तो दो कौड़ी का जेंटलमैन. लेकिन एक व्याख्या ने सारे सपने चकनाचूर कर दिए. एक बार फिर से साबित हो गया कि व्याख्या करने वालों और तर्क देने वालों ने इतिहास के बड़े-बड़े महापुरुषों, नेताओं, कवियों, लेखकों, प्रशासकों और यहाँ तक कि ब्लागरों की जेंटलमैनी धूल में मिला दी है. अब देखिये न, इस जेंटलमैनी व्याख्या के बहाने कितने लोग जमीन पर हैं. व्याख्या से साबित कर दिया गया कि समीर भाई की श्रृगाररस की कविता पॉडकास्टित होकर रौद्ररस को प्राप्ति कर लेती है. ये व्याख्या की वजह से ही हुआ है. धन्य हैं व्याख्या करनेवाले जिन्हें दूसरों की जेंटलमैनी जरा भी नहीं भायी. जहाँ तक बालकिशन को निपटाने की बात है तो मैंने परम्परा का हवाला देकर उन्हें निपटाने की कोशिश की थी. लेकिन समस्या ये है कि बालकिशन अभी तक ख़ुद को यंग जनरेशन का समझता है. पैंतीस साल पार करने के बाद भी बन्दे पर अचानक कम्यूनिष्ट बनने का धुन सवार है. उसने मेरी परम्परा वाली बात को यह कहकर मानने से इनकार कर दिया कि वह यंग जनरेशन का है और यंग जनरेशन को परम्पाराओं पर जरा भी भरोसा नहीं है. उसने तो यहाँ तक कहा कि पैंतीस साल का होने के बाद उसने हर स्थापित परम्परा को तोड़ने का फैसला कर लिया है. अब ऐसे में इस यंग ब्लॉगर को कौन समझाता?आपकी लिखी चिट्ठी पर प्रत्यक्षा जी ने कमेन्ट नहीं करते हुए लिखा है कि “शिव जी पहले टिप्पणी कर लें ..फिर हम”. प्रत्यक्षा जी, मैंने टिप्पणी की जगह पूरी चिट्ठी ही लिख दी है. अब आप मेरी इस चिट्ठी पर कमेन्ट कीजियेगा.बाकी क्या लिखूं? इस चिट्ठी को तार समझियेगा और एक टिप्पणी जरूर दीजियेगा.आपका अनुजशिव
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