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Posted on July 3rd, 2009
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चल दिए— आसमां से— बादलों के ऊपर — ये जमीं है या आसमां— लो भाई पहुँच गए —-

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'साध-साध रो गिलो रे, ते आप-आप रो मत! सुणजो रे शहर रा लोका, ए तेरापन्थी तन्त॥'

Posted on July 3rd, 2009
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ते रापन्थ के आध-पुरुष स्वामी भिखणजी एक सत्य- सधायक एवम सिद्धान्तनिषठ आचार्य थे। स्वामीजी एक उत्सकृष्ठ सन्त थे। उनकी उत्सकृष्ठता का मूल कारण था आचार और व

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यस गे लार्ड....!

Posted on July 3rd, 2009
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अरे भैया, अलेक्जेंडर द ग्रेट को क्यूं बदनाम करते हो। अब उसकी क्या ग़लती थी। बेचारे की आत्मा बहुत बद्दुआ दे रही होगी। ज़िंदा था तो किसी की हिम्मत नहीं हुई

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लंठ महाचर्चा: ओझवा के ठेंगे से

Posted on July 3rd, 2009
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परबतिया के माई और बाउ प्रसंग का अंत इसके बाद वाली पोस्ट में होगा । हालात कुछ ऐसे हो गए कि यह पोस्ट ठेलनी पड़ी। मूढ़ इतना मूरख नहीं कि समय के अनुसार न बदले।

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हसीना उर्फ आटो

Posted on July 3rd, 2009
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इधर आटो रिक्शाओँ के अध्ययन में जुटा, तो कई ज्ञान की बातें मालूम पड़ीं। एक आटो के पीछे लिखा था-फिर मिलेंगे। ऐसा अकसर होता है आटो वाले से पूछें कि अलां कालोन

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क्षितिज

Posted on July 3rd, 2009
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क्षितिज अपूर्व तुम्हारा मिलन है तुम भरमाते आह्लादित करते और मन को एक सहारा देते कि मिलते हैं पृथ्वी और आकाश। तुम्हारा मिलन एक असत्य सत्य है, तुम्हें न दि

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मैने एक सपना देखा था

Posted on July 3rd, 2009
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मैने एक सपना देखा था.

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प्रगति

Posted on July 3rd, 2009
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बहुत दूर से चली आ रही हूँ ये सोच कर चल रही हूँ, कि कभी न कभी, घर आएगा जी उछल जायेगा, मन मुस्काएगा, थके तन और मन, दोनों को मिलेगी एक थाह, सुस्ताने की अब प्रबल हो ग

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लंठ महाचर्चा: ओझवा के ठेंगे से

Posted on July 3rd, 2009
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_परबतिया के माई और बाउ
प्रसंग__ का अंत इसके बाद
वाली पोस्ट में होगा ।
हालात कुछ ऐसे हो गए कि यह
पोस्ट ठेलनी पड़ी। मूढ़
इतना मूरख नहीं कि समय के
अनुसार न बदले।

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कौन धाम, कहां के वासी?

Posted on July 3rd, 2009
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गुम्बद के लिए अंग्रेजी का डोम शब्द हिन्दी के लिए जाना पहचाना है। सभ्यता के विकासक्रम में डोम मूलतः आश्रय था। स हकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम, निहकामी स

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